हस्तमैथुन

हस्तमैथुन , समाज में तुच्छ समझी जाने वाली एक आम कृया। एक शारीरीक प्रणाली जिसका नौंवीं और दसवीं की जीवविज्ञान पुस्तकों में कोई अस्तित्व नहीं, पर समाज के इस सत्य को झुठला भी तो नहीं सकता। एक रसायनिक प्रकृया जिससे मस्तिष्क में डोपअमीन नामक रसायन और पॉर्न साइट के मालिकों के अकाउंट में लक्ष्मी का संचार होता है। एक लत जिसपर करोड़ों डॉलर का एक पूरा उद्योग निर्भर है। मनोरंजन उद्योग में जो कुछ नग्न है, शारीरक रूप से उत्तेजक है, उसकी परिकल्पना का आधार एवं एकमात्र टार्गेट, हस्तमैथून के दैनिक व्रतपालक ही हैं। एक नितांत निजी कृया, जिसके सामाज पर पड़ने वाले प्रभाव को गंभीरता से लेना कई बुद्धिजीवियों ने अस्वीकार कर दिया है।
ये विषय माँगता है गहन विष्लेशण, लगन, मेहनत और सबसे बढकर आत्मग्लानि से ऊपर उठकर सत्य को स्वीकार करने का साहस। पाठक ध्यान दे की अबतक मैंने ‘अश्लील’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। ये बात कुछ हद तक मुद्दे पर मेरा पक्ष स्पष्ट करती है। मेरी राय में जबतक कलंक के अंधेरे में ये विषय छुपा रहेगा, बहस नहीं होगी, विचार सामने नहीं आएँगे तबतक लोग असुरक्षित रहेंगे। और मैं स्त्रियों की असुरक्षा की बात नहीं कर रहा, कर रहा हूँ स्वास्थ्य के पक्ष से। शारीरक और मानसिक स्वास्थ्य के पक्ष से। चरित्र पर दाग पड़ जाने के भय से जो असुरक्षा की भावना मन.में होती है, उसके पक्ष से।

राजू एक स्कूली युवा है, नहीं ये वो आम नब्बे के दशक वाला, वॉकमैन पर संगीत सुनने वाला और हर नयी पिक्चर के लिए थियेटर पहुँचने वाला युवा नहीं है। ये इक्कीसवीं सदी का यूट्यूब पर जवान हुआ बालक है। जिसने ‘लगान’ के ‘भुवन’ से पहले “भुवन बाम” को देखा है। जो दुनिया भर को जानता पहचानता है, जिसने इक पूरी उम्र सक्रीन से चिपक कर गुज़ारी है। जो किडनी दे दे पर स्मार्टफोन न दे, एसी फसल की पैदावार है हमारा राजू।
राजू स्कूल भी फोन लेकर जाता है यद्यपि इस बारे में शिक्षकों और अभिभावकों को कोई जानकारी नहीं है पर स्कूल का हर बन्दा जानता है की ‘द कूल गैंग’ का सरगना राजू हरदिन फोन स्कूल लेकर ज़रूर आता है। दसवीं का छात्र है अपना राजू, पूरा नाम राजेन्द्र गिरी। दो विषयों में दो-दो बार लाल दाग लग चुका है और शकिला के पटने के कोई आसार भी न के बराबर लगते हैं। जीवन में दुख बहुत और दोस्तों की टोली में किसी की ग#* में इतना दम नहीं था की शराब जुगाड़ कर सके या ला दी जाए तो पी सके। राजू में खुद भी नहीं था। ये वो लौंडे थे जो हर शाम तैयार होकर, पापा की मोटरसाइकिल चुराकर, खासतौर पर लड़कियों को ट्यूशन पढ़ाने वाली लेडी टीचर के घर का चक्कर लगाया करते थे। काश कोई दिख जाए, कोई एकबार देख ले, जो देख ले, बस उसी से सेटिंग हो जाए, बस यही तमन्ना थी इनकी। बाईक पर ट्रीपल लोड, पीछे गुड्डू और इम्तियाज़ को लेकर हर दिन सेन्ट्रल साईट की गली नं० 3 का चक्कर लगाना ही एकमात्र जीने का मकसद हो गया था राजू के लिए। शकीला को पिंक ड्रेस में देखने के लिए जान की बाज़ी भी लगा सकता था राजू। इम्तियाज़ और राजू जिनकी दोस्ती की कसमें क्लास वाले दूसरी कक्षा से खा रहे थे, इनके बीच भी तकरार का कारण बनी शकीला। राजू ने एक मूहुर्त भी नहीं गवाया इम्तियाज़ का गट्टा थामने में, उसने शकीला को गाली क्या दे दी, आसमान फट पड़ा। और फिर वो कोई आम गाली थी भी नहीं रं#* कहा था उसने। शुद्ध भाषा में वैश्या। ये बात उसने राजू के परिवार के किसी को कही होती तो शायद उसे कम फर्क पड़ता। बहरहाल बहस(हाथापाई) क्लास मॉनिटर प्रीतम के मैटर में इन्वाल्व होने पर हुई। प्रीतम उस प्रकार का लीच था जो चिपक जाए तो तब तक न छोड़ो जबतक क्लासटीचर अपराधी को प्रिंसिपल चेंबर न भेज दें। प्रीतम छोड़ेगा तो नहीं ये जानते हुए दोनों ने आगे से रिश्वत की पेशकश की। प्रीतम चालाक और लंपट इन्सान, तुरंत जेब से पेनड्राइव निकाल कर राजू के हाथ में पकड़ाया और कायदे से सर हिलाकर समझा दिया,”फुल कर देना”। अब हर नायाब वीडियो पर प्रीतम का हक था। पर सौदा इतना आसान कहाँ था। हरामी ने राजू के फोन में लगे 16जीबी के चिप, 500 रुपये और दोनों में से किसी एक के टिफिन की माँग अलग से कर दी। राजू की तो जैसे जान ही निकल गई। गोपनीय फोल्डर में रखीं शकीला की सारी तस्वीरें, चुपके से बनाया गया कॉलेज वाली पड़ोसन के नहाने का विडियो और भी सविता भाभी का अंक 12 से 27 और भी कई राजू के जीवन के गुप्त रहस्य उसमें मौजूद थे। थोड़ा रोने-गाने पर वो चिप शाम तक लेने के लिए मान गया पर 500 रुपये और टिफिन तो उसे तभी चाहिए थे, जो की दिए भी गये। आखिरकार मामला शांत हुआ। टन-टन-टन-टन-टन-टन, घंटी के स्वर पे सभी उठकर अपने बस्ते तैयार करने लगे, छुट्टी तो हो गई पर राजू और इम्तियाज़ के दिमाग में अभी भी प्रीतम की माँगें पूरी करने की टेंशन थी।
घर आते ही राजू लैपटॉप अॉन कर के बैठ गया, पेनड्राईव लगाया, अभी तक इस बात पर सोच भी नहीं पाया था की उसने अपने बेस्ट फ्रेंड पर हाथ उठाया था कि उसका ध्यान फिर भटक गया। उसे कुछ नया दिखा था, कुछ अनूठा। इतना आकर्षक की उसका ध्यान इस बात से हटा सके की अब उसके और इम्तियाज़ के बीच दुश्मनी हो गई है। ये उसके 100 जीबी के कलेक्शन में पड़े-पड़े सड़ रहा एक नायाब विडिओ था, एक अनूठा पीस। सिर्फ थम्बनेल ही इतना आकर्षक की आँखें ठहर जाएँ। ये वीडियो तीन समलैंगिक सत्रियों के संभोग का विडिओ था जिन्हें बाद में एक पुरुष भी ज्वाइन करता है। विडिओ की शुरुआत में बैकग्राउंड में संगीत बज रहा होता है जिसकी जगह बाद में मदहोश चीखें ले लेती हैं। आज घर पर कोई नहीं था। राजू का घर इतना बड़ा और पडोसी के घर इतना शोर था की वो ये विडियो की सारी चीखें बढिया वॉल्युम पर स्पीकर में सुन सकता था पर उसने इयरफोन इस्तेमाल करना बेहतर समझा। आज वो ये वीडियो देखेगा, शुरू से अंत तक बस लिंग को मुँह में लेने वाला भाग उसे पसंद नहीं, उसे वो स्किप कर जाएगा। शुरुआत का संगीत उसे अदनान सामी की याद दिलाता है , पता नहीं क्यों। धिरे-धिरे राजू विडिओ में खो जाता है। अंधेरा रूम लैपटॉप से आ रही हल्की सफेद रौशनी में नहाए हुए है। राजू खुद को वीडियो के भीतर पाता है। बाकी दुनिया का अब कोई अर्थ नहीं है। उन सत्रियों की उत्तेजनाओं में खुद की उत्तेजना खोजते राजू के हाथ उसके लिंग तक पहुँचते हैं। एक नये आयाम में प्रवेश करता है राजू। दुनिया में अर्थ है, दुनिया सार्थक है, साश्वत है। आज पडोसन के शरीर के हर अंग की कल्पना फिर से की गई। उत्तप्त शरीर से पसीने की धाराएँ, गंगा-यमुना सी बह रही हैं। श्वास तीव्र है, चारों की। अभी तक दूसरे पुरुष ने कमरे में प्रवेश नहीं किया है। राजू उन तीनों के साथ अकेला है। इन तीनों के होते हुए भी पता नहीं क्यूँ ध्यान भटक जाता है। कल्पना पर वश नहीं रहता। नग्नावस्था में पहली बार प्रवेश करती है वो जिसको छूने तो क्या सोचने तक का अधिकार राजू ने स्वयं के अलावा किसी को नहीं दिया। वो अप्सरा जिसके चाहनेवालों में अक्सर हाथापाई हो जाती थी। जिसकी गुलाबी ड्रेस देखकर राजू ने अपने छोटे शहर को जयपुर समझ लिया था। शकिला। ये पाप है। उसने सोचा। पर पाप तो हो चुका था। उसने कर दिया था, चित्रगुप्त ने नोट कर लिया था, अपने लेटरपैड पर स्टाम्प लगा दिया था। अब कुछ नहीं हो सकता। तो फिर हर हद को पार कर लिया जाए, हो जाए संभोग आज स्वप्नपरि उस सत्री के साथ। पर ये क्या वो पुरुष प्रवेश कर रहा है। वो हाथ बढाता है और उसके हाथ शकीला की ओर बढते हैं। नहीं इइइ..!!!…इससे पहले की राजू कुछ कर पाता या अपना विरोध दर्ज करवा पाता। किस्सा खत्म था। कुछ भावी डाक्टर, इंजीनियर (जो अब दुनिया न देख पाएँगे) ज़मीन पर पड़े थे। अब बस आँखों से आँसू और ज़मीन से उनको पोंछना बाकी था।
लोग कुछ भी कहें पर कुछ तो असर होता है इस पूरी प्रक्रिया का। कुछ ज़रूर होता है।

-पार्थो बनर्जी
ये इस सीरीज की पहली कहानी है। इसे पढकर मुझे दो कौड़ी का अश्लील लेखक न समझें, ये कोशिश है समाज के दबे प्रश्नों पर से पर्दा हटाने की। साथ बने रहिए बातें और स्पष्ट होती चलेंगी।

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Hostel chhodte waqt

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एक उजाड़ बन सूनी बस्ती
को हाथों से सजाया था।
दो गज़ के कमरे को अपना
घर बनाया था।
कितनी बारिशों में झूमकर,
छत पे नहाए थे।
सुख-दुःख के हमने साथ में,
कितने गीत गाए थे।
बिछुड़े हुओं को पास में,
हम फिर बुलाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ
हम फिर बनाएँगे।

ठिठोलियों अठखेलियों में
रातें बीत जाती थी।
कभी भूले से न ऐसा हुआ,
कि घर की याद आती थी।
कभी लड़ पड़े एक दूसरे से,
हाथापाई भी हुई।
कभी उछल पड़े सब साथ में,
ज़ख्मी चारपाई भी हुई।
सबको साथ लाना है बस,
वो भी कर दिखाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ
हम फिर बनाएँगे।

दोस्ती की गहराई को,
अंदर अंदर ही समझा था।
खाली हाथ खुश रहना,
साथ आकर ही समझा था।
जो तेरे पर कुछ आ बनी,
उसे अपने ऊपर ही समझा था।
उस साथ बनाए आशियाँ को,
हमने तो घर ही समझा था।
मस्तियों का वो अड्डा,
हम फिर जमाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ,
हम फिर बनाएँगे।

आठ साल की उम्र में

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आठ साल की उम्र में
मैं ने जो दुनिया देखी थी।
जिस दुनिया में ख़ौफ़ नहीं था,
मैं ने वो दुनिया देखी थी।

उस उम्र का बच्चा आखिर
किससे क्या कुछ कहता है?
उसने सुना था किसी मन्दिर, मसजिद में,
कोई ईश्वर रहता है।

उसने मान लिया हर दिन,
अब पूजा करने जाती थी,
सारी सहेलियाँ उसी वक्त,
नमाज़ें पढ़कर आती थीं।

कुछ दिन से एक सहेली
नहीं समय पर आती थी,
सोचकर उसके बारे में,
ये बच्ची बहुत घबराती थी।

एक दिन जाकर मन्दिर में,
उसने बड़ी आस से देखा था।
श्रीराम की भरी आँखों से,
आसिफा को पास से देखा था।

के किसी ने घिनौनी सोच को अपनी
है अपना ही धर्म किया।
मन्दिर की चारदीवारी में,
जिसने वैसा दुष्कर्म किया।

अरे उसी मुहल्ले, उस गली के पीछे,
अरे वहीं पर आन मिला,
उस पीपल के पेड़ के नीचे
मुझे रोता भगवान मिला।

के मेरे राम से नाम के पीछे,
कब तक उसे छिपाओगे?
तुम मुझको गाली देते हो,
तुम मन्दिर कैसा बनाओगे?

के अब तो एक हो जा ओ,
दुहाई है भगवान की,
हम सारे आदम के बच्चे,
औलादें हैं इनसान की।

भारत बंद

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सरे सड़क दंगा हंगामा
कौन किधर जाने को है?
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

जलती बसें और घायल सड़कें,
देख खुदा का दिल भी धड़के,
इस आगज़नी से इन्तहां की,
एक लौ हवा पाने को है।
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

कैसा इन्साफ़ कैसा कानून?
कैसा रंज कैसा जुनून?
लहुलुहान ये मुल्क मेरा,
अभी और चोट खाने को है,
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

देश ये मेरा हिन्द नशे में,
जैसे कोई रिन्द नशे में,
लगातार ये खून पीने की,
कैसी हवस छाने को है?
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

सरे आम मंज़र कैसा है?
अमन के सीने खंजर धंसा है।
पथराव करते-करते अकल पर
खुद पत्थर पड़ जाने को है,
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

गली मुहल्लों और चौंक पर,
चलो सभी साथ जुट जाएँ,
लड़ें अमन के लिए साथ में,
या साथ-साथ मिट जाएँ।
बैठे रहें तो कभी देश में,
नहीं अमन आने को है।
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

कौन बता दो इस शहर में आज फिर खाली बैठे होंगे?

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दुनिया बड़ी हरकत में है,
कोई नहीं फ़ुरसत में है,
मसरूफ़ रहना आज सभी की
आदत में है, ज़हनत में है,
सुनने आज मेरी और कौन
बजाने ताली बैठे होंगे?
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

रोज़ खाना रोज़ कमाना,
ज़िन्दगी का ताना-बाना,
और सुबह उठकर फिर हरदिन
वैसे के वैसे काम पर जाना,
कौन निकम्मे, बेकार, नशेड़ी,
शायर खियाली बैठे होंगे?
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

हमारी हैरत जादू उनके,
हमारी शामें गेसू उनके,
हमारी आँहें आँसू उनके,
इसी गली मौजूदा उनके
आशिक मवाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

नन्हें कदमों से बढ़ने वाले,
नए-नए सपने गढ़ने वाले,
इस्कूल में पढ़ने वाले,
छोटे सिपाही अगली गली
बस आने वाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

आसमान ये बहुत बड़ा है,
मेरा चाँद मुझसे दूर खड़ा है,
तन्हाई की स्याह रात में,
पास न आने को अड़ा है,
आसमान के जुगनू ये तारे,
है रात काली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

ऐ सपेरे, क्या सुन्दर आगाज़ तेरा है,
कितना सुरीला साज़ तेरा है,
बहुत अलग अंदाज़ तेरा है,
शहर के सारे साँप तेरे आगे,
तेरी धुन मतवाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा (शिर्षक किसी और का पंक्तियाँ मेरी)

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देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।
देख तेरा वृक्ष ये कितना मलिन है,
बाँधना घोंसला इस पर तो अब,
कितना कठिन है,
छोड़ पीछे पंछी चले अपना बसेरा।
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

जो जलती चिता है, आगे मेरी अगरबत्तियाँ,
तारे हों तेरे मेरी केवल मोमबत्तियाँ,
पंखे पे लटकी हैं, वो हैं मेरी रस्सियाँ।
जो तेरा सूरज मेरा है चाँद, कैसा सवेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

पुकारता है पुर्खों का मेरे प्रताप मुझको,
सुनाई पड़ता है विधवाओं का विलाप मुझको,
याद आता है किसी लोमड़ी का अभिशाप मुझको,
कैसी विचित्र मनोदशा ने मुझको है घेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

सारे आँसू सिर्फ मेरे ही लिए हैं,
विषाद के सारे हलाहल पी लिए हैं,
दुख के सारे क्षण भी मैंने जी लिए हैं,
लौटता हूँ के समय को दो संज्ञान मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

मृत्यु के सबसे निकट विकराल हूँ मैं,
फोड़ता सर शवों के स्वयं नरकंकाल हूँ मैं,
हाँ तुम्हारे समाज का कुपित चाण्डाल हूँ मैं,
तुम्हारी चिता की लकड़ियों से ये चित्र मैंने है उकेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

जब व्यथा कविता की भाँति है निकलती,
और अनकहे रास्तों पर अकेले चलती,
जब ज़िन्दगी की बोटियों पर गत मचलती,
ये मेरी व्यथा है या कथा है पद्य मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

स्वच्छ भारत तुम बना दो,
कूड़ेदानी से उठा दो,
मुझको मेरी माँ दिला दो,
अनाथ हूँ, कोई बता दो नाम मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

अज्ञान में नहाए, शक्तियों से खेलता है,
मनुष्य आज धरती पर अपना देवता है,
घटा से झाँकता, हँसता कोई किञ्चित देखता है,
हे मनुज कितना जटिल सौभाग्य तेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

तेरे प्राण हाथों दाब उड़ुँ तो क्या करेगा?
सीधे तुझसे आ भिड़ुँ तो क्या करेगा?
निराकार ब्रह्म से आकर जुड़ुँ तो क्या करेगा?
हे यम, खाता खोल, छुट्टे दे कर हिसाब मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

कौन होता है अग्नि परीक्षा लेने वाला,
कौन होता है राम उसको कहने वाला,
कब तक चुप रहेगा आखिर ये सब सहने वाला?
नारी कब जागेगा आत्मसम्मान तेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं

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तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं,
वो बारिशों की गीली सड़कों पे,
यूँ ही मंडराना,
छोटी बड़ी हर बात पर न जाने,
यूँ ही घबराना,
दिल की कोठरी में बंद ये लम्हें,
इन पर सपनों के दरबान यूँ मुस्तैद हैं।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

ऐ वक्त मुझसे सौदा कर ले,
चाहे चल समझौता कर ले,
हर तरकीब भीड़ा ले, कोशिश कर,
कोई दाव दे कोई पेंच दे।
मुझको उनके साथ बिताईं,
दो मासूम सी घड़ियाँ बेच दे।
अब छोड़ दिया है सोचना, क्या वैध है अवैध है।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

किसी को दिखाने के नहीं,
अपना राज़ बताने के नहीं,
तब पास आने के नहीं,
अब दूर जाने के नहीं,
मस्तियों के साथ गुज़ारे,
वो पल भुलाने के नहीं।
कुछ संजोए पन्नों में इन नादान पलों की ज़ैद है।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

या मेरे आने से पहले,
या जाने के बाद रखना,
बाकी दोस्तों से तुम मेरी,
बस एक ही फ़रियाद रखना।
के कहा है उसने तुम सभी से,
दुआओं में याद रखना।
लाल पीले हरे गुलाबी सारे रंग आज सफैद हैं।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

गरीब हम सारे

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हैं गरीब हम सारे,
न बच्चा कोई, बीवी नहीं है।
जो रात-दिन चीखते हैं हिन्दू-मुसलिम,
उनसे कहो हमारे घर टीवी नहीं है।
चादर बिछाकर ज़मीन पर हम लेटते हैं,
और अख़बार के पन्नों से रोटियाँ लपेटे हैं।
हमारे हाथों की चाय पीते
मन करे कुछ और करना।
कुछ बोलता है जब गरीब,
तुम ज़रा सा ग़ौर करना।
चाय मत समझो इसे,
के मेरा ख़ून है ये,
भट्ठी में जलती ज़िन्दगी में,
जीने का जुनून है ये।
हाँ पैसे कमाये तुमने,
कल तुम्हारी चाय बदली।
आज नये हैं दोस्त,
तुम्हारी राय बदली।
अब लगता है देश में
गरीबी नाम की है।
कल जो निकम्मी सरकार थी,
अब काम की है।
जो गुल्लक दान पेटी थी तुम्हारी,
तोड़ दी है।
गरीबों को दान देने की भी आदत,
छोड़ दी है।
पार्टी में लगाने के हैं पैसे,
टिकट का वायदा है।
और मैं जो मरूँ तो इसमें
सबका फ़ायदा है।
मैं सोचता हूँ क्या तेरे ही कारण
देश ये जर्जर हुआ है?
क्या तेरे ही सिगरेट के धुँए से
मुझे कैंसर हुआ है?
हादसे में मरने वालों के घरों में
लाख देना।
और मैं जो मरूँ तो कबर पर ज़रा सी,
ख़ाक देना।
पर मैं हूँ चौखट आगे फिर सीढियाँ हैं,
मेरे आगे कई कुपोषित पीढियाँ हैं।
याद रखना तुम अमीरों की ज़ात की,
मेरी ज़ात माँ है।
और हाँ के मेरा ख़ात्मा,
तेरा ख़ात्मा है।

स्टीवन हॉकिंग को श्रद्धांजलि

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चला जाता है कोई धरा से,
समय को उसका इतिहास सिखा।
किसी की कल्पना के अन्धकार में
जिसको जीवित शून्य दिखा।

शरीर की सीमाओं से बाहर,
उस अलौकिक आभा को श्रद्धांजलि।
उस दिग्गज वैज्ञानिक को,
उस विशिष्ट प्रतिभा को श्रद्धांजलि।

इट इज़ अबाउट अ सैड नॉस्टेल्जिया

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बेमतलब की रौशनी में,
अनमोल अन्धेरे खो दिए।
गुज़री रात के इन्तज़ार में,
कितने सवेरे खो दिए।
कुछ गहरे समंदर सी आँखें,
कुछ गेसू खनेरे खो दिए।
वो रो पड़े, हम हँस दिए,
दोनों ने बसेरे खो दिए।
वो आग ज़ालिम थी कि अगर,
वो राख़ मुलायम बिस्तर थी,
उस जली राख़ के चारकोल से,
कुछ सपने उकेरे खो दिए।