Hostel chhodte waqt

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एक उजाड़ बन सूनी बस्ती
को हाथों से सजाया था।
दो गज़ के कमरे को अपना
घर बनाया था।
कितनी बारिशों में झूमकर,
छत पे नहाए थे।
सुख-दुःख के हमने साथ में,
कितने गीत गाए थे।
बिछुड़े हुओं को पास में,
हम फिर बुलाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ
हम फिर बनाएँगे।

ठिठोलियों अठखेलियों में
रातें बीत जाती थी।
कभी भूले से न ऐसा हुआ,
कि घर की याद आती थी।
कभी लड़ पड़े एक दूसरे से,
हाथापाई भी हुई।
कभी उछल पड़े सब साथ में,
ज़ख्मी चारपाई भी हुई।
सबको साथ लाना है बस,
वो भी कर दिखाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ
हम फिर बनाएँगे।

दोस्ती की गहराई को,
अंदर अंदर ही समझा था।
खाली हाथ खुश रहना,
साथ आकर ही समझा था।
जो तेरे पर कुछ आ बनी,
उसे अपने ऊपर ही समझा था।
उस साथ बनाए आशियाँ को,
हमने तो घर ही समझा था।
मस्तियों का वो अड्डा,
हम फिर जमाएँगे।
दो गज़ का आशियाँ,
हम फिर बनाएँगे।

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आठ साल की उम्र में

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आठ साल की उम्र में
मैं ने जो दुनिया देखी थी।
जिस दुनिया में ख़ौफ़ नहीं था,
मैं ने वो दुनिया देखी थी।

उस उम्र का बच्चा आखिर
किससे क्या कुछ कहता है?
उसने सुना था किसी मन्दिर, मसजिद में,
कोई ईश्वर रहता है।

उसने मान लिया हर दिन,
अब पूजा करने जाती थी,
सारी सहेलियाँ उसी वक्त,
नमाज़ें पढ़कर आती थीं।

कुछ दिन से एक सहेली
नहीं समय पर आती थी,
सोचकर उसके बारे में,
ये बच्ची बहुत घबराती थी।

एक दिन जाकर मन्दिर में,
उसने बड़ी आस से देखा था।
श्रीराम की भरी आँखों से,
आसिफा को पास से देखा था।

के किसी ने घिनौनी सोच को अपनी
है अपना ही धर्म किया।
मन्दिर की चारदीवारी में,
जिसने वैसा दुष्कर्म किया।

अरे उसी मुहल्ले, उस गली के पीछे,
अरे वहीं पर आन मिला,
उस पीपल के पेड़ के नीचे
मुझे रोता भगवान मिला।

के मेरे राम से नाम के पीछे,
कब तक उसे छिपाओगे?
तुम मुझको गाली देते हो,
तुम मन्दिर कैसा बनाओगे?

के अब तो एक हो जा ओ,
दुहाई है भगवान की,
हम सारे आदम के बच्चे,
औलादें हैं इनसान की।

भारत बंद

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सरे सड़क दंगा हंगामा
कौन किधर जाने को है?
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

जलती बसें और घायल सड़कें,
देख खुदा का दिल भी धड़के,
इस आगज़नी से इन्तहां की,
एक लौ हवा पाने को है।
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

कैसा इन्साफ़ कैसा कानून?
कैसा रंज कैसा जुनून?
लहुलुहान ये मुल्क मेरा,
अभी और चोट खाने को है,
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

देश ये मेरा हिन्द नशे में,
जैसे कोई रिन्द नशे में,
लगातार ये खून पीने की,
कैसी हवस छाने को है?
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

सरे आम मंज़र कैसा है?
अमन के सीने खंजर धंसा है।
पथराव करते-करते अकल पर
खुद पत्थर पड़ जाने को है,
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

गली मुहल्लों और चौंक पर,
चलो सभी साथ जुट जाएँ,
लड़ें अमन के लिए साथ में,
या साथ-साथ मिट जाएँ।
बैठे रहें तो कभी देश में,
नहीं अमन आने को है।
इस बंद के आगे अब
एक और बंद आने को है।

कौन बता दो इस शहर में आज फिर खाली बैठे होंगे?

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दुनिया बड़ी हरकत में है,
कोई नहीं फ़ुरसत में है,
मसरूफ़ रहना आज सभी की
आदत में है, ज़हनत में है,
सुनने आज मेरी और कौन
बजाने ताली बैठे होंगे?
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

रोज़ खाना रोज़ कमाना,
ज़िन्दगी का ताना-बाना,
और सुबह उठकर फिर हरदिन
वैसे के वैसे काम पर जाना,
कौन निकम्मे, बेकार, नशेड़ी,
शायर खियाली बैठे होंगे?
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

हमारी हैरत जादू उनके,
हमारी शामें गेसू उनके,
हमारी आँहें आँसू उनके,
इसी गली मौजूदा उनके
आशिक मवाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

नन्हें कदमों से बढ़ने वाले,
नए-नए सपने गढ़ने वाले,
इस्कूल में पढ़ने वाले,
छोटे सिपाही अगली गली
बस आने वाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

आसमान ये बहुत बड़ा है,
मेरा चाँद मुझसे दूर खड़ा है,
तन्हाई की स्याह रात में,
पास न आने को अड़ा है,
आसमान के जुगनू ये तारे,
है रात काली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

ऐ सपेरे, क्या सुन्दर आगाज़ तेरा है,
कितना सुरीला साज़ तेरा है,
बहुत अलग अंदाज़ तेरा है,
शहर के सारे साँप तेरे आगे,
तेरी धुन मतवाली बैठे होंगे।
कौन बता दो इस शहर में
आज फिर खाली बैठे होंगे?

देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा (शिर्षक किसी और का पंक्तियाँ मेरी)

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देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।
देख तेरा वृक्ष ये कितना मलिन है,
बाँधना घोंसला इस पर तो अब,
कितना कठिन है,
छोड़ पीछे पंछी चले अपना बसेरा।
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

जो जलती चिता है, आगे मेरी अगरबत्तियाँ,
तारे हों तेरे मेरी केवल मोमबत्तियाँ,
पंखे पे लटकी हैं, वो हैं मेरी रस्सियाँ।
जो तेरा सूरज मेरा है चाँद, कैसा सवेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

पुकारता है पुर्खों का मेरे प्रताप मुझको,
सुनाई पड़ता है विधवाओं का विलाप मुझको,
याद आता है किसी लोमड़ी का अभिशाप मुझको,
कैसी विचित्र मनोदशा ने मुझको है घेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

सारे आँसू सिर्फ मेरे ही लिए हैं,
विषाद के सारे हलाहल पी लिए हैं,
दुख के सारे क्षण भी मैंने जी लिए हैं,
लौटता हूँ के समय को दो संज्ञान मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

मृत्यु के सबसे निकट विकराल हूँ मैं,
फोड़ता सर शवों के स्वयं नरकंकाल हूँ मैं,
हाँ तुम्हारे समाज का कुपित चाण्डाल हूँ मैं,
तुम्हारी चिता की लकड़ियों से ये चित्र मैंने है उकेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

जब व्यथा कविता की भाँति है निकलती,
और अनकहे रास्तों पर अकेले चलती,
जब ज़िन्दगी की बोटियों पर गत मचलती,
ये मेरी व्यथा है या कथा है पद्य मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

स्वच्छ भारत तुम बना दो,
कूड़ेदानी से उठा दो,
मुझको मेरी माँ दिला दो,
अनाथ हूँ, कोई बता दो नाम मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

अज्ञान में नहाए, शक्तियों से खेलता है,
मनुष्य आज धरती पर अपना देवता है,
घटा से झाँकता, हँसता कोई किञ्चित देखता है,
हे मनुज कितना जटिल सौभाग्य तेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

तेरे प्राण हाथों दाब उड़ुँ तो क्या करेगा?
सीधे तुझसे आ भिड़ुँ तो क्या करेगा?
निराकार ब्रह्म से आकर जुड़ुँ तो क्या करेगा?
हे यम, खाता खोल, छुट्टे दे कर हिसाब मेरा,
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

कौन होता है अग्नि परीक्षा लेने वाला,
कौन होता है राम उसको कहने वाला,
कब तक चुप रहेगा आखिर ये सब सहने वाला?
नारी कब जागेगा आत्मसम्मान तेरा?
देख तेरे दीपक तले कितना अंधेरा।

तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं

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तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं,
वो बारिशों की गीली सड़कों पे,
यूँ ही मंडराना,
छोटी बड़ी हर बात पर न जाने,
यूँ ही घबराना,
दिल की कोठरी में बंद ये लम्हें,
इन पर सपनों के दरबान यूँ मुस्तैद हैं।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

ऐ वक्त मुझसे सौदा कर ले,
चाहे चल समझौता कर ले,
हर तरकीब भीड़ा ले, कोशिश कर,
कोई दाव दे कोई पेंच दे।
मुझको उनके साथ बिताईं,
दो मासूम सी घड़ियाँ बेच दे।
अब छोड़ दिया है सोचना, क्या वैध है अवैध है।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

किसी को दिखाने के नहीं,
अपना राज़ बताने के नहीं,
तब पास आने के नहीं,
अब दूर जाने के नहीं,
मस्तियों के साथ गुज़ारे,
वो पल भुलाने के नहीं।
कुछ संजोए पन्नों में इन नादान पलों की ज़ैद है।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

या मेरे आने से पहले,
या जाने के बाद रखना,
बाकी दोस्तों से तुम मेरी,
बस एक ही फ़रियाद रखना।
के कहा है उसने तुम सभी से,
दुआओं में याद रखना।
लाल पीले हरे गुलाबी सारे रंग आज सफैद हैं।
तुम्हारे साथ बिताए वो पल सारे डायरी में कैद हैं।

गरीब हम सारे

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हैं गरीब हम सारे,
न बच्चा कोई, बीवी नहीं है।
जो रात-दिन चीखते हैं हिन्दू-मुसलिम,
उनसे कहो हमारे घर टीवी नहीं है।
चादर बिछाकर ज़मीन पर हम लेटते हैं,
और अख़बार के पन्नों से रोटियाँ लपेटे हैं।
हमारे हाथों की चाय पीते
मन करे कुछ और करना।
कुछ बोलता है जब गरीब,
तुम ज़रा सा ग़ौर करना।
चाय मत समझो इसे,
के मेरा ख़ून है ये,
भट्ठी में जलती ज़िन्दगी में,
जीने का जुनून है ये।
हाँ पैसे कमाये तुमने,
कल तुम्हारी चाय बदली।
आज नये हैं दोस्त,
तुम्हारी राय बदली।
अब लगता है देश में
गरीबी नाम की है।
कल जो निकम्मी सरकार थी,
अब काम की है।
जो गुल्लक दान पेटी थी तुम्हारी,
तोड़ दी है।
गरीबों को दान देने की भी आदत,
छोड़ दी है।
पार्टी में लगाने के हैं पैसे,
टिकट का वायदा है।
और मैं जो मरूँ तो इसमें
सबका फ़ायदा है।
मैं सोचता हूँ क्या तेरे ही कारण
देश ये जर्जर हुआ है?
क्या तेरे ही सिगरेट के धुँए से
मुझे कैंसर हुआ है?
हादसे में मरने वालों के घरों में
लाख देना।
और मैं जो मरूँ तो कबर पर ज़रा सी,
ख़ाक देना।
पर मैं हूँ चौखट आगे फिर सीढियाँ हैं,
मेरे आगे कई कुपोषित पीढियाँ हैं।
याद रखना तुम अमीरों की ज़ात की,
मेरी ज़ात माँ है।
और हाँ के मेरा ख़ात्मा,
तेरा ख़ात्मा है।

स्टीवन हॉकिंग को श्रद्धांजलि

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चला जाता है कोई धरा से,
समय को उसका इतिहास सिखा।
किसी की कल्पना के अन्धकार में
जिसको जीवित शून्य दिखा।

शरीर की सीमाओं से बाहर,
उस अलौकिक आभा को श्रद्धांजलि।
उस दिग्गज वैज्ञानिक को,
उस विशिष्ट प्रतिभा को श्रद्धांजलि।

इट इज़ अबाउट अ सैड नॉस्टेल्जिया

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बेमतलब की रौशनी में,
अनमोल अन्धेरे खो दिए।
गुज़री रात के इन्तज़ार में,
कितने सवेरे खो दिए।
कुछ गहरे समंदर सी आँखें,
कुछ गेसू खनेरे खो दिए।
वो रो पड़े, हम हँस दिए,
दोनों ने बसेरे खो दिए।
वो आग ज़ालिम थी कि अगर,
वो राख़ मुलायम बिस्तर थी,
उस जली राख़ के चारकोल से,
कुछ सपने उकेरे खो दिए।

दो शेर मेरी नानी , जो की खुद एक कवित्री हैं, उनके नाम

मौत को कुछ दिन लगेंगे,
अभी कुछ देर बाकि है।
कुछ बूढ़ी नज़्में, अधेड़ ग़ज़लें,
अभी कुछ शेर बाकि हैं।

लिख रही हूँ अब अपनी तारीख मैं खुद से,
हो ही जाएगी ज़रा हेर-फेर बाकी है।
अभी तो मेरे जीवन में फिर से राम आएँगे,
मेरे चखे हुए जूठे अभी कुछ बेर बाकि हैं।